A devotee’s heartfelt poem for her Divine Friend Dadashreeji.

ऐसा क्या है तुझमें कि

जिक्र तेरा आते ही

मैं बच्ची बन जाती हूँ

अविरल बहते अपने आंसुओं को

रोक ही नहीं पाती हूँ

तेरी कृपा के एहसास में

खुद को डूबा हुआ पाती हूँ

मन करता है फिर एक बार पहले की तरह

उँगली थाम कर चलूँ तेरी

अपनी हर चिंता हर परेशानी सौंप कर तुझे

उड़ू निष्फिक्र सी मैं बावरी

भूख लगे जब भी मुझे

तेरे हाथों से दो निवाले खा लूँ

सोँऊ जब भी मैं  तेरे आँचल तले

तेरी मीठी सी लोरी का मजा पा लूँ।

आपके चरण कमलों में

सीमा गुप्ता

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