Ab Aajao Vaapas Dada

जब तुम चुप थे 

अंतर्मुख थे …

न कोई शब्द 

न कोई बात 

बस श्रण भर दर्शन 

कैसे तुम रह पाए दादा ?

क्यों इतना हमें तरसाए दादा ?

जब हम चुप थे  

अंतर्मुख थे 

ह्रदय से शब्द 

ह्रदय से बातें 

हर श्रण प्रेम के सुमन 

तुम पर बरसा रहे थे दादा !

जम कर कृपा बरसा रहे थे दादा !
जब तुम चुप थे 

अंतर्मुख थे 

न कोई प्रश्न 

न कोई जवाब 

क्योँ इतना याद आए दादा ?

क्योँ इतना हमें रुलाये दादा?

जब हम चुप थे 

अंतर्मुख थे 

तुम्हारे बदलाव और उन्नति  में 

डूबे थे हम 

 दृढ़ता और जूनून 

हर श्रण जगा रहे थे  दादा !

सत्य से पहचान करा रहे थे  दादा !
कब से चुप थे 

अंतर्मुख थे 

 अपने बच्चों को और 

बहकाएं न दादा 

सब्र का बाँध 

डूबायें न दादा 

अपने मीठे बोल सुनने के लिए

और हमें तरसायें न दादा 

कब से चुप थे  

अंतर्मुख थे  

इंतज़ार हमें भी था 

प्रेम से कोई बुलाये दादा ..

प्रेम से कोई जगाये दादा ..

प्रेम से कोई बोले दादा, 

“बहुत हो गया , अब वापस आ जाओ दादा |”

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